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कैंसर के खिलाफ लड़ाई में अर्ली डिटेक्शन और नई थेरेपी बन रही गेम चेंजर



लखनऊ 22 मार्च 2026। भारत में कैंसर एक तेजी से बढ़ती पब्लिक हेल्थ चुनौती बनता जा रहा है और आने वाले वर्षों में इसके मामलों में लगातार वृद्धि होने की आशंका है। बदलती लाइफस्टाइल, बढ़ती उम्र, पर्यावरणीय कारण और तंबाकू का उपयोग इस बीमारी के बढ़ते बोझ के प्रमुख कारण हैं। महिलाओं में ब्रेस्ट, सर्वाइकल और ओवेरियन कैंसर सबसे ज्यादा देखे जाते हैं, जबकि पुरुषों में लंग, ओरल और प्रोस्टेट कैंसर आम हैं। खास तौर पर भारत में स्मोकलेस टोबैको के अधिक इस्तेमाल के कारण ओरल कैंसर के मामले ज्यादा हैं। साथ ही, एक चिंताजनक ट्रेंड यह भी है कि कई कैंसर अब कम उम्र में ही डायग्नोज हो रहे हैं।

एक बड़ी समस्या देर से पहचान (डिलेयड डायग्नोसिस) भी है, क्योंकि कई मरीज तब तक डॉक्टर के पास नहीं जाते जब तक लक्षण गंभीर न हो जाएं। इससे इलाज की सफलता और सर्वाइवल रेट पर असर पड़ता है, खासकर ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर जैसे मामलों में जहां शुरुआती पहचान से बेहतर रिजल्ट मिल सकते हैं। देश के कुछ हिस्सों, विशेषकर उत्तरी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में कैंसर का बोझ अधिक देखा जा रहा है।

मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के चेयरमैन डॉ. (प्रो.) एसवीएस देव ने बताया “कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए सरकार और प्राइवेट हेल्थकेयर सेक्टर दोनों ही इंफ्रास्ट्रक्चर और सेवाओं को मजबूत करने पर काम कर रहे हैं। हाल के हेल्थ बजट में कैंसर ट्रीटमेंट सुविधाओं को बेहतर बनाने और जिला स्तर पर डे-केयर कैंसर सेंटर स्थापित करने पर जोर दिया गया है। साथ ही, प्राइवेट सेक्टर भी टियर-2 और टियर-3 शहरों में एडवांस ऑन्कोलॉजी सेंटर स्थापित कर रहा है, जिससे बड़े शहरों के बाहर रहने वाले मरीजों के लिए इलाज की पहुंच आसान हो रही है। इसके साथ ही प्रिवेंशन, अर्ली डिटेक्शन और अवेयरनेस पर भी ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। स्क्रीनिंग प्रोग्राम, वैक्सीनेशन और हेल्दी लाइफस्टाइल को बढ़ावा देने वाले अभियान कैंसर के कुल बोझ को कम करने में मदद कर रहे हैं। सरकार की हेल्थ इंश्योरेंस योजनाएं और जरूरी दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण भी इलाज को अधिक किफायती बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में भी पिछले कुछ वर्षों में बड़ी तकनीकी प्रगति हुई है, जिससे कैंसर सर्जरी अधिक सटीक और कम इनवेसिव हो गई है। रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी एक अहम उपलब्धि के रूप में उभरी है, जिसमें 3D विजुअलाइजेशन और हाई प्रिसिशन के साथ जटिल सर्जरी करना संभव हो गया है। यह तकनीक प्रोस्टेट, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और गायनेकोलॉजिकल कैंसर में तेजी से इस्तेमाल हो रही है।

डॉ. देव ने आगे बताया “इमेज-गाइडेड और फ्लोरोसेंस-असिस्टेड सर्जरी जैसी तकनीकों से सर्जन ट्यूमर की सीमाओं को बेहतर तरीके से पहचान पाते हैं, जिससे ट्यूमर को पूरी तरह हटाते हुए आसपास के हेल्दी टिश्यू को सुरक्षित रखा जा सकता है। इसके अलावा, लैप्रोस्कोपिक और रोबोटिक जैसी मिनिमली इनवेसिव सर्जरी अब ज्यादा प्रचलित हो रही हैं, जिनमें छोटे चीरे, कम दर्द, कम अस्पताल में रहने का समय और तेज रिकवरी जैसे फायदे मिलते हैं। 3D सर्जिकल प्लानिंग और एडवांस इमेजिंग तकनीकें भी जटिल ट्यूमर की सटीक मैपिंग में मदद कर रही हैं, जिससे बेहतर इलाज संभव हो रहा है। कैंसर के इलाज में अब मल्टीमोडल अप्रोच अपनाई जा रही है, जिसमें सर्जरी के साथ अन्य थेरेपी को जोड़ा जाता है ताकि बेहतर परिणाम मिल सकें। इम्यूनोथेरेपी और टारगेटेड थेरेपी जैसे आधुनिक इलाज कई एडवांस कैंसर में प्रभावी विकल्प बनकर सामने आए हैं, जो शरीर की इम्यून सिस्टम को मजबूत कर कैंसर सेल्स से लड़ने में मदद करते हैं।“

कुछ एब्डॉमिनल कैंसर में सर्जरी के साथ HIPEC (हाइपरथर्मिक इंट्रापेरिटोनियल कीमोथेरेपी) और PIPAC (प्रेशराइज्ड इंट्रापेरिटोनियल एरोसोल कीमोथेरेपी) जैसी तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे दवा सीधे प्रभावित हिस्से तक पहुंचाई जा सके। इसके अलावा, मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स में प्रगति से ब्लड में मौजूद ट्यूमर डीएनए का विश्लेषण कर पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान बनाने में मदद मिल रही है। सेलुलर थेरेपी, जैसे T-सेल आधारित उपचारों पर भी तेजी से रिसर्च हो रही है, जो कठिन कैंसर के इलाज में नई उम्मीद दे रही हैं।

कुल मिलाकर, बढ़ती जागरूकता, मजबूत होते हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर और तेजी से विकसित हो रही तकनीकों के चलते भारत में कैंसर के इलाज का फोकस अब अर्ली डायग्नोसिस, पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट और बेहतर सर्वाइवल रेट की ओर बढ़ रहा है। आने वाले समय में पब्लिक हेल्थ प्रोग्राम, प्राइवेट हेल्थकेयर और रिसर्च संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल इस चुनौती से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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